अन्नदाताओं के संघर्ष को हमें अपना बनाना होगा

अंग्रेज तो चले गए और अपनी छूत की कई बीमारी देश में छोड़ गए, जिसमें फूट डालो और राज करो के दांव-पेंच भी शामिल हैं… जाति, धर्म, गरीब-अमीर या अन्य तरीकों से समाज को बांटकर हमारे होशियार नेता राज करते आए हैं, जिनमें अफसरों का दिमाग भी शामिल है… अन्नदाता यानि किसान भी इस दांव से वंचित नहीं रहे… हालांकि उनके साथ तो हमेशा ही छल होता रहा है… 50 साल से अधिक तक देश पर राज करने वाली निकम्मी कांग्रेस ने गरीब और किसान के नाम पर वोट तो मांगे, मगर उन्हें रखा मोहताज ही… खेती को लाभ का धंधा बनाने वाले भाजपा सहित अन्य दल भी इस मामले में कांग्रेस की फोटो कॉपी नजर आए हैं… किसानों को उनकी उपज के सही दाम ही नहीं मिल रहे और इसे केन्द्र की सरकार महंगाई घटना बताती रही है… 5 साल में किसानों की आय दो गुनी करना है, तब तक खाद-बीज से लेकर तमाम उपभोक्ता सामग्री के भाव दो गुना से अधिक बढ़ जाएंगे… सक्षम किसानों या कागजों पर भ्रष्टाचार की कमाई को खेती की कमाई बताने वालों पर कार्रवाई के साथ आयकर सहित अन्य कर वसूले जाना चाहिए, लेकिन गरीब किसान को भरपूर कर छूट और रियायत मिलना चाहिए… असली किसान तो बेचारा आज भी फटेहाल और कर्ज में डूबा है और बिचौलिये मस्ती छान रहे हैं… अभी इंदौर सहित प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसान आंदोलन शुरू हुआ, जिसने हम शहरवासियों को दूध और सब्जियों से वंचित कर दो-तीन दिन में ही नानी-दादी याद दिला दी… 1 जून को भाजपा और संघ समर्थित भारतीय किसान संघ इस आंदोलन से खुद को दूर बताता है और 3 जून को अचानक आंदोलन का श्रेय अन्य दल न ले लें, लिहाजा उसे समर्थन देने कूद पड़ता है… एक सुनियोजित रणनीति के तहत भारतीय किसान संघ की इस आंदोलन में जबरिया घुसपैठ कराई गई, ताकि समझौते और मांगों को मानने की मनचाही पटकथा लिखी जा सके… हुआ भी यही… 4 जून को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ जो आंदोलन में शामिल ही नहीं थे, उनकी चर्चा हुई और मांगों को मानने के ऐलान के साथ ताबड़तोड़ आदोलन ंसमाप्ति की घोषणा हो गई और मुख्यमंत्री ने भी दनादन 4-5 ट्वीट पेल डाले… इधर आंदोलन कर रहे भारतीय किसान यूनियन और राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने इस फूट डालो और राज करो की नीति की निंदा करते हुए किसान आंदोलन 10 जून तक जारी रखने की घोषणा कर डाली… इस दांवबाजी के चलते आम जनता जबरन पिसा गई और पैसा देने के बावजूद दूध, सब्जी, फल से वंचित हो गई… इसका असल जिम्मेदार कौन है..? अन्नदाता की वाजिब मांगों को स्वीकार किया जाना चाहिए और उन्हें अलग-अलग यूनियनों में बंटा हुआ देखने का चश्मा भी बदला जाए… जनता भी किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम चुकाए और दूध, साग-भाजी, फल या अनाज में थोड़ी-बहुत वृद्धि पर महंगाई का रोना न रोए, क्योंकि वही जनता 70 रुपए लीटर का पेट्रोल खुशी-खुशी भराती है और मल्टी फ्लेक्स में जाकर 200 रुपए की सिनेमा की टिकट भी खरीदती है… आम आदमी को अवश्य सस्ती सामग्री उपलब्ध होना चाहिए, मगर जो सक्षम हैं, वह पूरा और हो सके तो अधिक मूल्य भी चुकाएं और सरकार पूरी सख्ती से किसानों को बिचौलियों से मुक्त कराए… अन्नदाता के इस संघर्ष को हर व्यक्ति को अपना खुद का संघर्ष बनाना होगा, तभी हमारा जीवन यापन हो सकेगा… वरना स्थिति वैसे इस शेर की तरह भी पूरी तरह चरितार्थ नजर आएगी…

जो हमारे गांव के खेतों में भूख उगने लगी,
मेरे किसानों ने शहरों में नौकरी कर ली।

(राजेश ज्वेल)
9827020830

(लेखक परिचय : इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय)

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