क्‍या हमारे मुंह में जहर है?

– डॉ कविता यादव, प्रोग्राम कॉर्डिनेटर, टॉक्सिक लिंक्‍स। विचार व्‍यक्तिगत हैं।

आम जनता के स्‍वास्‍थ्‍य को नुकसान पहुंचाने के लिहाज से शीर्ष 10 रसायनों में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) ने पारद (मर्क्‍यूरी) को रखा है। इससे पर्यावरण और मानव स्‍वास्‍थ्‍य को महत्‍वपूर्ण रूप से क्षति पहुंचती है। इसका जहरीला असर स्‍नायु तंत्र, पाचन तंत्र और रोग प्रतिरोधी प्रणाली के साथ-साथ लंग्‍स, किडनी, त्‍वचा और आखों पर होता है। पारद की काफी कम मात्रा के संपर्क में आने से भी स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी गंभीर समस्‍याएं हो सकती हैं। यह गर्भ और शुरुआती अवस्‍था में बच्‍चे के विकास के लिए खतरा है। पारद के संपर्क में आने से जुड़े खतरों को देखते हुए इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) वर्ल्‍ड कंजर्वेशन कांग्रेस (डब्‍ल्‍यूसीसी-2012) ने सस्‍टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्‍टीट्यूट (एसडीपीआई) मोशन (एम-169) अपनाया और इंटरगवर्नमेंटल निगोशिएटिंग कमिटी (आईएनसी) के प्रतिनिधियों से पारद पर कानूनी रूप से अनिवार्य समझौते के समर्थन के लिए बातचीत की। इसका उद्देश्‍य मानव स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण को नुकसानदेह और जहरीले पारद से सुरक्षित रखना था।
जनवरी, 2013 में जिनेवा में 140 देशों ने अभूतपूर्व रूप से पारद पर विश्‍व के सबसे पहले कानूनी रूप से बाध्‍यकारी संधि को अपनाया। इसे अब ‘मिनामाता कन्‍वेंशन ऑन मर्क्‍यूरी’ के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्‍य स्‍वास्‍थ्‍य के लिए नुकसानदेह पारद के इस्‍तेमाल और उत्‍सर्जन को सीमित करना था। इस समझौते पर आज की तारीख में 94 देश पहले ही हस्‍ताक्षर कर चुके हैं। चूंकि भारत ने भी 2014 में मिनामाता समझौते पर हस्‍ताक्षर किया था इसलिए पारद को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा गया है। अब सवाल उठता है कि पारद है क्‍या और यह हमें किस प्रकार प्रभावित करता है।
पारद प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक तरल धातु है और यह विभिन्‍न रूपों जैसे अपने मूल रूप (धातु) और अकार्बनिक और कार्बनिक तौर पर पाया जाता है। जरा सोचिए, अगर हम ऐसे जहरीले रसायन के संपर्क में रोज-रोज आएं तो क्‍या होगा? जब हमलोगों के दांत में दर्द होता है तो कितने लोग डेंटिस्‍ट के पास जाते हैं और उनसे दांतों को भरने के लिए इस्‍तेमाल किए जाने वाले पदार्थ के बारे में पूछते हैं? दांतों को भरने के काम आने वाले सभी पदार्थों में से एक ऐसी चीज है जिसके बारे में हमें जागरूक होने की जरूरत है और वह है डेंटल एमलगम , क्‍योंकि भार के हिसाब से इनमें लगभग 50 फीसदी पारद होता है। वर्तमान पीढ़ी की जीवनशैली के मद्देनजर, शुरुआती अवस्‍था में ही बच्‍चों में आसानी से दांतों का क्षय विकसित हो सकता है और उनके दांत भरवाने की जरूरत हो सकती है। इस प्रकार वे पारद जैसे नुकसानदेह रसायन के संपर्क में आते हैं।
आम जनता के लिए, जो एमलगम से दांत भरवाते हैं, उनके लिए दांतों को भरने वाला पदार्थ लगातार पारद धातु के संपर्क में आने का जाना-माना स्रोत है। अब कितना पारद उस पदार्थ से बाहर आएगा, य‍ह कई कारकों पर निर्भर करता है जैसे दांतों की भराई का आकार क्‍या है, भरने का सतही क्षेत्र कितना है, दांत कौन सा है और उसे किस तरह भरा गया है, चबाना, किस तरह का भोजन किया जाता है, दांत पीसना, ब्रश करना, दांतों की बनावट और दांत की भराई कब की गई।
पारद के वाष्‍प का एक बड़ा हिस्‍सा (तत्‍व के रूप में) दांत भरने वाले पदार्थ से निकलता है जो खून में मिल जाता है और फिर विभिन्‍न अंगों तक पहुंचता है। तत्‍व के रूप में पारद फैट में आसानी से घुल-मिल जाता है और यह रक्‍त के माध्‍यम से मस्तिष्‍क और गर्भनाल जैसी बाधाओं को पार कर सकता है और वहां पहुंचकर ऑक्सिकरण के बाद यह अकार्बनिक रूप में आ जाता है। अकार्बनिक रूप में एक बार आ जाने के बाद, पारद की गति सीमित हो जाती है और इस प्रकार यह मस्तिष्‍क और गर्भ के उतकों में संचित होता जाता है। पारद का अकार्बनिक लवण त्‍वचा, आंखें और जठरांत्र के रास्‍ते (गैस्‍ट्रोइंटेस्‍टाइनल ट्रैक्‍ट) के लिए क्षयकारी होता है।
इस प्रकार से मूत्र, मल, खून, लार, छोड़ी गई सांस, किडनी, पिट्यूटरी ग्‍लैंड, लीवर और स्‍तन के दूध में भी पारद की मात्रा बढ़ सकती है। अध्‍ययनों में पाया गया है कि दांतों को भरवाने से औसत तौर पर प्रतिदिन 4 से 19 माइक्रोग्राम पारद शरीर के भीतर जा सकता है। शरीर के विभिन्‍न प्रणालियों की क्षति के अलावा, पारद से मुंह में छाले वाले अल्‍सर, सफेद रंग के धब्‍बे और मुंह में जलन जैसी बीमारियां भी होती हैं।
दांत भरने के दौरान पारद की सारी मात्रा भराई में ही नहीं चली जाती है, बल्कि इसका एक हिस्‍सा पर्यावरण में भी घुल-मिल जाता है। एक बार पर्यावरण में आने के बाद यह केवल अपने स्रोत तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि कभी-कभार तो यह उस स्रोत से हजारों किमी दूर तक पहुंच जाता है। पारद को जीवाणु मेथिलमर्क्‍यूरी में भी बदल सकते हैं जो कहीं ज्‍यादा जहरीला होता है क्‍योंकि यह खाद्य श्रृंखला में संचित होता जाता है और फिर जैव-आवर्धन की प्रक्रिया से गुजरता है। उदाहरण के तौर पर बड़ी शिकारी मछलियों में पारद की अधिक मात्रा होने की संभावना ज्‍यादा होती है क्‍योंकि वह छोटी-छोटी मछलियां खाती है। मेथिलमर्क्‍यूरी के संपर्क में इस प्रकार आने से स्‍नायविक विकास में गड़बड़ी आ सकती है। परिणामस्‍वरूप, जो बच्‍चे गर्भ में ही मेथिलमर्क्‍यूरी के संपर्क में आते हैं उनमें संज्ञानात्‍मक सोच, स्‍मरण शक्ति, ध्‍यान देने, भाषा और देखकर बारीक तरीके से हाथ-पांव से किए जाने वाले काम की क्षमता (फाइन मोटर एक्टिविटी) बहुत अधिक प्रभावित होती है।
दांत भरवाने से पारद के संपर्क में आने से होने वाले उपरोक्‍त वर्णित स्‍वास्‍थ्‍य समस्याएं सिर्फ उस रोगी तक ही सीमित नहीं रहते। दांत के डॉक्‍टर्स भी दांत भरने के घोल का मिश्रण तैयार करते समय उच्‍च सांद्रता वाले पारद के संपर्क में आते हैं साथ ही उस मिश्रण को हटाने के समय भी वे इसके संपर्क में आते हैं।
हाल में हुए कई अध्‍ययनों से इस बात के सबूत मिलते हैं कि अन्‍य लोगों की तुलना में दांत के इलाज से जुड़े लोगों लोगों के शरीर में ज्‍यादा मात्रा में पारद पाया जाता है। न केवल रोगी बल्कि दांत के डॉक्‍टर्स को भी दांत भरने में इस्‍तेमाल किए जाने वाले मिश्रण से दूर रहना चाहिए।
तो फिर इतनी बड़ी समस्या से कैसे बचा जाए ? इस समस्‍या का एक व्‍याहारिक और तात्‍कालिक समाधान तो यह है कि दांतों की भराई के लिए पारद के मिश्रण की जगह वैकल्पिक मिश्रण का इस्‍तेमाल किया जाए। वर्तमान में उपलब्‍ध जीआईसी और कंपोजिट्स अपेक्षाकृत ज्‍यादा सुरक्षित हैं जो न केवल खूबसूरती से डिजाइन किए गए हैं बल्कि दांत भराई के मिश्रण को व‍ह ताकत भी देते हैं जो चबाने में लगने वाले बल के अनुकूल होता है।
इसलिए, दांत के इलाज से जुड़े लोग पारद मुक्‍त सबसे बेहतरीन तरीका अपनाकर पारद प्रदूषण की त्रासदी से निपटने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और आम जनता दांत की भराई के लिए विकल्‍पों को चुन सकती है। इस प्रकार, सकारात्‍मक बदलाव की मांग बढ़ेगी।अगली बार जब आप अपने डेंटिस्ट के पास जाएं तो पारद रहित विकल्प के बारे में पूछना न भूलें।

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