होश में आओ ‘शिवराज’

कैसी सुबह हुई कि उजाले नहीं रहें..
मेहनतकशों के हाथों निवाले नहीं रहे..
अपनी नजर के सामने अपने वतन का गम..
अच्छा हुआ कि देखने वाले नहीं रहे.

अर्पण जैन ‘अविचल’

बाजार की चकाचौंध में भीड़ के पैमाने तय करती राजनीति आज धरतीपुत्रों के सुर्ख और मेहनतनशी लाल रक्त से आचमन कर रही है | जिस रक्तकण को खेतों में अपने पसीने के साथ बहाकर फसलों को जीवन दिया ओर सामान्य जनजीवन को भोजन, आज वहीं रक्तकण मध्यप्रदेश की धरा के भाल का सिंदूर बनने हेतु लालायित होकर निछावर हो रहा है |
जय जवान जय किसान का नारा मरो जवान मरो किसान के नारे में तब्दील हो गया, संघर्ष की टूटी हुई बैसाखीयाँ भी अब अपाहिज से प्रदेश को चलाने में असमर्थ हो रही है |
हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और सत्ता के सिंहासन पर बैठे राजन की भूमिका में रहे शिवराज अब शवराज साबित हो रहे हैं |
धरती के लाल की मांग जायज हो या नाजायज पर संघर्ष की सियासत का यह अवसाद प्रदेश के विकास की गगनचुम्भी इमारतों को बोना साबित कर रहा है |
आधा पखवाड़ा बीतने में है, किसान सड़कों पर आन्दोलित है और व्यवस्था चरमरा रही है, फिर भी राजा को राज्य की दुर्दशा पर चिन्ता नहीं, पुलिस गोलियों से स्वागत करते हुए जान ले रही है और सियासत मौन तमाशा देख रही |
आखिर यह कैसा अघोषित आपातकाल?
प्रदेश के हालातों पर काबू पाने में असमर्थ प्रदेश सरकार इंटरनेट सेवाएं, फोन, आवागमन बाधित करने पर तुली हुई है…
हफ्ते भर से लोगों को दूध, सब्जी आदि दैनिक आवश्यकताओं की चीजो के लिए भी जुझना पड़ रहा है, वैकल्पिक व्यवस्थाएँ भी दम तोड़ रही है, किसान उग्र है, और उग्रता का परिणाम जनता भुगत रही है |
यह कौन-सा स्वांग रचा जा रहा है प्रदेश में? कैसा प्रदर्शन, कैसा आंदोलन , जहाँ बदला सरकार से लेना चाहिए वहाँ तैनाती जनता पर |
धरती के श्रृंगार का यूँ उजड़ कर सड़कों पर फैंका जाना भी सहज जायज नहीं लगता परन्तु गुबार तो गुबार है , सर्वस्व अर्पण करके ही मानता है |
वर्तमान में प्रदेश में जिस भी तरह के हालात है, उन्हे देखकर तो लगता है, सीयासत के तमाशें ने लाशों के डेर लगाने में भी कोई कमी नहीं की |
खैर,
राजस्थान का गुर्जर आंदोलन, हरियाणा का जाट आंदोलन, और गुजरात के पटेलों का अनामत आंदोलन गवाह है बर्बरता के इतिहास का, उसमें अबतक बचा मध्यप्रदेश भी शामिल हो जाएगा, किसानों के संघर्ष के आन्दोलन के साथ |
भारत के भाग्यविधाताओं के इस आन्दोलन का रुख क्या होगा यह तो अब सत्ता के वराहमीहिर ही बता पाएंगे, परन्तु परिणाम तो आम जनमानस को ही भुगतना है, यह तय है |
समय के साथ आन्दोलन उग्रता को धारण करते हुए चिन्ता की लकीरें अर्पण कर रहा है , और बैसुध सीयासत इसमें भी राजनीतिक चालों की गुत्थीयाँ सुलझा रही है |
होश में आओ ‘शिवराज’
स्वयं को किसान का पुत्र कहने वाले मुख्यमंत्री जी, ये धरती आपकी भी माँ है, और माता कुमाता न देखी, पर पुत जरुर कुपुत्र हो जाते है, जैसा की आज नजर आ रहा है |
प्रदेश में राजनीतिक प्रपंचों में धरतीपुत्रों के संघर्ष की अस्थियाँ बहा रहे हो?
क्यों कोई समाधान नहीं देरहे, बल्कि प्रदेश को आपकी हठधर्मी जवाबदेही ने आज अघोषित अवसाद के दावानल में झौंक दिया और किसानों को उकसाकर अपने ही प्रदेशवासीयों के लिए दुर्जन बनने पर मजबुर कर दिया |
सत्य से सताये हुए ही माओवाद और आतंक को जन्म देते है , यह भी कटु सत्य है |
समय की गर्जना को पहचान कर समय रहते उपचार करों, वर्ना यह बदले की आग पुरे प्रदेश को चपेट में लेकर स्वाह कर देगी, और साथ ही साथ प्रदेश के माथे पर कलंक का तिलक भी अर्पण कर देगी |

अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार (खबर हलचल न्यूज)
इंदौर, मध्यप्रदेश

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